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भगवान परशुराम पुराण

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‘भगवान परशुराम जयंती पर विशेष लेख ‘
‘भक्ति एवं शक्ति के प्रतीक भगवान् परशुराम’

– डा. विक्रम शर्मा, सुनाम
अध्यक्ष, श्री ब्राह्मण सभा रजि: पंजाब ।

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Description

भगवान् विष्णु जी के दशावतारों में तीन राम हुए-भागर्व राम (परशुरामजी), रघुनंदन राम(श्री रामचन्द्र जी)और यदुनन्दन राम (बलराम जी)। परशुराम ब्रह्माजी के वंशज, शिवजी के शिष्य व विष्णु जी के अवतार के हुए। परशुराम का बाल्यावस्था का नाम ‘’राम ‘’ है।भगवान् शिवजी की कृपा से उन्हें सिद्धि प्राप्त हुई। भगवान् शिवजी की कृपा से प्रसाद रूप परशु ‘विद्युदभि’ जैसे अमोघ शस्त्र को प्राप्त किया और तभी से बाल्यावस्था का नाम राम से ‘परशुराम ’ विख्यात हुआ। परशुराम का जन्म महर्षि भृगु द्वारा स्थापित वंश में होने के कारण ऋषिकुल में जन्म लेने वाला यह एक मात्र ही अवतार है।चिरंजीवि भगवान परशुराम जी, भगवान् विष्णु जी के छठे और अंश अवतार हैं। भगवान् परशुराम जी ब्रह्मविद्या एवं शस्त्र विद्या में पारंगत, शस्त्रास्त्र विद्या में निष्णात्
, धर्नुवेद के रचयिता,गौ और ब्राह्मण के रक्षक, दीन-हीन एवं दलितों के उद्धारक हुए। यही उनका ‘’भक्ति एवं शक्ति ‘’का स्वरूप है। परशुराम जी में भक्ति एवं शक्ति का समावेश ‘चरू’ के प्रभाव से हुआ। उनके बाहरी आवरण में क्षत्रिय माता और ‘क्षात्र चरू’ के प्रभाव से क्षत्रियत्व यानि शक्ति और भीतरी आवरण में ब्राह्मण पिता और ‘ब्राह्म चरू ‘ के प्रभाव से ब्राह्मणत्व यानि भक्ति का समावेश हुआ। महाविष्णु के दशावतार में से परशुराम मात्र चिरंजीव अवतार हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं ,’जब-जब धर्म का नाश होता है, अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं साधुओं की रक्षा के लिए तथा दर्जुनों के विनाश के लिए धर्म की पुर्न स्थापना हेतु बार-बार इस पृथ्वी पर निराकार स्वरूप से आकारी स्वरूप में आकर अवतार ग्रहण करता हूँ ‘। परशुराम की पहली परीक्षा इनके गुरू और पिता जमदग्रि ने ली थी। इनकी माता इक्ष्वाकु वंश के राजा रेणुक की बेटी रेणुका थी। उससे आर्यों द्वारा निर्मित ‘नीति पन्थ’ का उल्लंघन हो गया, जिसे जमदग्नि ने नीति पंथ का कट्टर समर्थक होने के नाते अक्ष्म्य माना। उसने अपने पुत्रों को माता का सिर काटने की आज्ञा दी। चारों पुत्रों में से केवल परशुराम ने पिता की आज्ञा को सर्वोच्च मान कर, उनके तपोबल और संजीवनी विद्या की विशेषज्ञता से परिचित होने के कारण पिता की आज्ञा का पालन किया। पिता जमदग्नि ने प्रसन्न होकर कहा, पुत्र! तुम पितृभक्ति की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए और उन्हें चिरंजीवि होने के साथ-साथ अमरता का वरदान दिया। भार्गव राम ने विचार किया कि धर्म-स्थापना, अधार्मिक कृत्यों का उन्मूलन यदि शास्त्र से संभव न हो तो उसकी रक्षा के हेतु शस्त्र उठाने में भी किसी प्रकार का संकोच नहीं करना चाहिये। कभी-कभी अहिंसा की रक्षा के लिये हिंसा भी अनिवार्य हो जाती है। परशुराम जी की प्रवल धारण और अमर उपदेश यह है कि; ‘अत्याचार करना पाप है परन्तु अत्याचार सहना तो महांपाप है’। ‘संत सिपाही’ की मौलिक संज्ञा वस्तुत: परशुराम जी के जीवन से ही प्रदर्शित हुई। सम्पूर्ण आर्यावर्त, नर्मदा से मथुरा तक शासन कर रहे हैहयराज सहस्त्रार्जुन के लोमहर्षक अत्याचारों से त्रस्त था। सहस्त्रार्जुन कार्तवीर्य ने भी मद वश जब परशुराम के पिता जी का वध कर दिया तो ब्राह्मण श्रेष्ठ परशुराम ने क्षत्रिय राजा सहस्त्रार्जुन कार्तवीर्य का वध कर स्वयं उसका शासन ग्रहण न करके सहस्त्रार्जुन कार्तवीर्य के ही पुत्र जयध्वज को अभिषिक्त कर दिया। अपने निवास के लिए सागर से भूमि छीनकर भगवान् परशुराम ने परशुराम क्षेत्र की स्थापना की और महेन्द्र पर्वत पर तपस्या में लीन हो गये। त्रेता युग में राक्षसों के विनाश हेतु सीता स्वयंवर में भगवान् राम को अपना वैष्णव धनुष प्रदान किया । द्वापर युग में भगवान कृष्ण को सुदर्शन चक्र का पुन: स्मरण करवाया और प्रदान किया , बलराम को शस्त्र रूप मे हल एवं मूसल प्रदान किए।भगवान् परशुराम ने कृष्ण और बलराम को गौरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण भी प्रदान किया। इनके मुख्य एवं प्रसिद्ध शिष्यों में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, एवं बलराम जी जैसे महारथी थे। भगवान् बुद्ध को भागर्व आश्रम बोध गया में ज्ञान दिया, कलयुग में होने वाले अवतार कल्कि को भगवान् परशुराम समस्त वेद, धर्नुवेद सम्पूर्ण कलाओं का ज्ञान प्रदान करेंगे। ये अपने साधकों-उपासकों तथा अधिकारी महापुरूषों को अब भी दर्शन देते हैं। इनकी साधना उपासना से भक्तों का कल्याण होता है।

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